Samundar ki Bebasi

कब तक चाहता रहेगा ज़िन्दगी को,

ज़िन्दगी को ज़िन्दगी पे छोड़ तो सही…

खुद की कैद से खुद को आज़ाद  कर,

ये सोच ही गलत है के – फिर वही ! फिर वही !….

 

आफ़ताब केवल जलाता नहीं है..

दिल पर जमी हर पर्त को इसमें पिघला देना।

हर हसीना के जाम को अंजाम होठो से देना,

नया दिन नया दौर होगी दिलकशी।

 

देख रोमांच कैसे दौड़ता है रगों में,

हवाले कर दे खुद को लहरों के।

ऐतबार कर सिर्फ इतना के हर लहर किनारे तक जाएगी,

मुह छुपाते फिरेगी समुन्दर की  बेबसी ।। – पथिक

WO!

वो इस कदर रूबरू होती थी मेरे अहसासों से,

मेरे अहसास आज भी महकतें  है।

तपती ज़िन्दगी में तेरी जुल्फों के साये,
बाल संवारते कभी नज़र तो आये…
हम उड़ाना नही जानते पर…
कटी पतंगों के पीछे तेरी गलियों में दौड़ते थे।। – पथिक
Image courtesy: https://s-media-cache-ak0.pinimg.com/564x/d5/e6/7e/d5e67ed2d45ba17c00490a4ec9d92f0a.jpg

Naavik

पतवार टूट जाये तो नाविक क्या करे.. ?

नाव के साथ रहे..लहरों के भरोसे..?

या समुन्दर में कूद जाये…हौसले के भरोसे..?

 

शायद क्षितिज पर किनारा होता.. तो तैरकर जाना आसान लगता.. ।

अब जब हर दिशा जल मग्न है… तो नाविक क्या करे ?

अगर क्षितिज पर मेघ गरजते… तो नाव में ही रहता…।

अब जब आसमान साफ़ है तो…नाविक क्या करे… ?

 

ये ज़िन्दगी बस यही लगती है… ।

समुन्दर की तरह…अथाह अनन्त…।

कभी मौत सी शांत… कभी तूफानों सी जीवंत… ।

और हम नाविक एक नाव पर… हर पल एक दुविधा में… ।

नाविक क्या करे… ??  -पथिक

 

Image courtesy: https://s3.amazonaws.com/s3.frank.itlab.us/photo-essays/small/oct_02_0702_boat.jpg

Rasm-adaai

कितने वक़्त तक रोशन था… मालूम नहीं…

दिया जला… जलकर बुझ गया….

न शगुन हुआ न अपशगुन…

रस्म अदाई की बात थी…. हो गयी… !! -पथिक

 

Image courtesy: https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/b/be/Diya_Diwali_India.jpg

Aaj Bhi

आज भी चुप हूँ मैं , आज भी समझने के कोशिश कर रहा हूँ।

आज भी उन्हीं सवालों से घिरा हूँ , आज भी जवाब पाने की कोशिश कर रहा हूँ।

आज भी तुम्हे याद करता हूँ , आज भी तुम्हे भूलाने की कोशिश कर रहा हूँ।

आज भी खत लिखता हूँ तुम्हें , आज भी जवाब आने की उम्मीद कर रहा हूँ।

कबसे रुकी है ज़िन्दगी , आज भी आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ।

आज भी अकेला चल रहा हूँ राहों में , आज भी हमसफ़र को पाने की दुआ कर रहा हूँ ।। -पथिक

Image courtesy: http://4.bp.blogspot.com/-cNxqlrqwxkw/VRzBufeb88I/AAAAAAAAD44/zPDY1WlE4oU/s1600/Quill-pen-parchment-and-ink-bottle-1.jpg

Sahasi Zindagi

साहसी ज़िंदगी।

गिरती उठती, कभी हार न मानती।

गर्मी में तपती, सर्दी में ठिठुरती।

सावन में मौज उड़ाती ज़िन्दगी।

बड़ी साहसी ज़िन्दगी।।

साहसी ज़िन्दगी।

आकाश को कभी बाहों में भरती,

कभी पानी में गोते  खाती ज़िन्दगी।

कभी अंतरिक्ष की ऊंचाइयों को चूमती,

कभी पाताल में पटकी खाती ज़िन्दगी।

कभी न रूकती, कभी न झुकती।

गिरती उठती, कभी हार न मानती।

हवाओं पे धोंस जमाती ज़िन्दगी।

बड़ी साहसी ज़िन्दगी।।

साहसी ज़िन्दगी।

कभी खिल उठती फूलों की तरह,

कभी बिन मौसम मुरझाती ज़िन्दगी।

कभी भूखे पेट सो जाती।

कभी पर्व मनाती ज़िन्दगी।

गिरती उठती, कभी हार न मानती।

बादलों पे दौड़ लगाती ज़िन्दगी।

बड़ी साहसी ज़िन्दगी।।   – पथिक

Image courtesy: http://im.rediff.com/getahead/2013/dec/19sumer-verma1.jpg

Madhur Hawa ke Geet

मधुर मधुर मृदुल मृदुल, मधुर हवा के गीत |

आसमान की नीली छाया, ये प्यार संगीत |

दिल मांगे आवाज़ चाँद से, महफ़िल में तारों के बीच |

मधुर मधुर मृदुल मृदुल, मधुर हवा के गीत…||

 

ये स्पर्श बड़ा अनोखा, जुगनू का तारों सा धोखा |

मन की अपनी बात अनोखी, बादल की अपनी प्रीत |

मधुर मधुर मृदुल मृदुल…||

 

बादल भी अपना भेद छुपाये, बहती हवा में बहता जाये |

सर सर करती हवा पुकारे, नीचे क्यों बैठा मुझे निहारे |

ओ मेरे मनमीत…|

मदर मधुर मृदुल मृदुल….||

 

बादल का उर भरने आया, नभ पर छाए काली छाया |

क्यों गाता है अपनी उदासी, मुझ  पर बरसा दे अपना सारा शोक |

और बसजा तारो के बीच…|

मधुर मधुर मृदुल मृदुल…||

 

मन कहता है सुनता जाऊँ, कभी मैं भी तारों संग गाऊँ |

पर कोई नहीं सुनता मुझको, ये हवा बड़ा गाती सुन्दर है |

ये हवा बड़ा गाती सुन्दर है, ये हवा बड़ी निर्भीक |

मधुर मधुर,मृदुल मृदुल…||

 

मैं बादल से करता बिनती, जरा ठहर कुछ दिखता मुझको |

इससे पहले कोई तस्वीर जो बनती, सखी निंद्रा हवा की आई |

कहीं कलेश दोनों में न हो जाए, डरकर मैंने ली आँखे मीच |

मधुर मधुर, मृदुल मृदुल, मधुर हवा के गीत || – पथिक

 

Image courtesy: https://s-media-cache-ak0.pinimg.com/600×315/a1/a4/04/a1a40467b5716f8577c1ac4ddb8b750f.jpg