Panaah…zindagi ki..!

 

आँखों में किसी की पनाह मांगोगे,
जब किसी से प्यार हो जायेगा…
आईने से नज़र तब ही मिलाओगे,
जब खुद पर ऐतबार हो जायेगा।
गुमराह वही होते है जो मंजिलो की तलाश में निकलते है,
बिन मंजिल रास्ते भी गलत नहीं होते।
मौत इतनी भी बदसूरत नहीं,
मिले आँखे खोलकर तो मौत से भी प्यार हो जायेगा।
कतार में खिसकती हुई भी कोई ज़िन्दगी है,
भुला दोगे मंजिलो को तो रास्तों से प्यार हो जायेगा।
बहारें किसे पसंद नही आती,
पतझड़ में पतंग उड़ाके तो देखो।
कागज़ की कश्ती भी पार लगती हैं,
बारिश में नाव चलाकर तो देखो।
प्यास तो लगती है अथाह सागर में भी,
कुछ लोग बरसते तूफानों से प्यास बुझाते हैं।
चाहतें किसे नहीं होती,
चाहतों में अंतर होता है,
जो भेद मिटा देते हैं चाहतों का,
उन्हें जिंदगी से प्यार हो जाता है। -पथिक
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Samundar ki Bebasi

कब तक चाहता रहेगा ज़िन्दगी को,

ज़िन्दगी को ज़िन्दगी पे छोड़ तो सही…

खुद की कैद से खुद को आज़ाद  कर,

ये सोच ही गलत है के – फिर वही ! फिर वही !….

 

आफ़ताब केवल जलाता नहीं है..

दिल पर जमी हर पर्त को इसमें पिघला देना।

हर हसीना के जाम को अंजाम होठो से देना,

नया दिन नया दौर होगी दिलकशी।

 

देख रोमांच कैसे दौड़ता है रगों में,

हवाले कर दे खुद को लहरों के।

ऐतबार कर सिर्फ इतना के हर लहर किनारे तक जाएगी,

मुह छुपाते फिरेगी समुन्दर की  बेबसी ।। – पथिक

Naavik

पतवार टूट जाये तो नाविक क्या करे.. ?

नाव के साथ रहे..लहरों के भरोसे..?

या समुन्दर में कूद जाये…हौसले के भरोसे..?

 

शायद क्षितिज पर किनारा होता.. तो तैरकर जाना आसान लगता.. ।

अब जब हर दिशा जल मग्न है… तो नाविक क्या करे ?

अगर क्षितिज पर मेघ गरजते… तो नाव में ही रहता…।

अब जब आसमान साफ़ है तो…नाविक क्या करे… ?

 

ये ज़िन्दगी बस यही लगती है… ।

समुन्दर की तरह…अथाह अनन्त…।

कभी मौत सी शांत… कभी तूफानों सी जीवंत… ।

और हम नाविक एक नाव पर… हर पल एक दुविधा में… ।

नाविक क्या करे… ??  -पथिक

 

Image courtesy: https://s3.amazonaws.com/s3.frank.itlab.us/photo-essays/small/oct_02_0702_boat.jpg

Sahasi Zindagi

साहसी ज़िंदगी।

गिरती उठती, कभी हार न मानती।

गर्मी में तपती, सर्दी में ठिठुरती।

सावन में मौज उड़ाती ज़िन्दगी।

बड़ी साहसी ज़िन्दगी।।

साहसी ज़िन्दगी।

आकाश को कभी बाहों में भरती,

कभी पानी में गोते  खाती ज़िन्दगी।

कभी अंतरिक्ष की ऊंचाइयों को चूमती,

कभी पाताल में पटकी खाती ज़िन्दगी।

कभी न रूकती, कभी न झुकती।

गिरती उठती, कभी हार न मानती।

हवाओं पे धोंस जमाती ज़िन्दगी।

बड़ी साहसी ज़िन्दगी।।

साहसी ज़िन्दगी।

कभी खिल उठती फूलों की तरह,

कभी बिन मौसम मुरझाती ज़िन्दगी।

कभी भूखे पेट सो जाती।

कभी पर्व मनाती ज़िन्दगी।

गिरती उठती, कभी हार न मानती।

बादलों पे दौड़ लगाती ज़िन्दगी।

बड़ी साहसी ज़िन्दगी।।   – पथिक

Image courtesy: http://im.rediff.com/getahead/2013/dec/19sumer-verma1.jpg

Ek Sitara

कितनों को उम्मीद बँधाता है…एक मामूली टूटता सितारा |

हम तो फिर भी गर्दिश के वो तारे हैं..जिन्हे धरती अपने सीने में जगह देती है |

वो टूटते सितारे खूब सिखाते हैं..शोर नहीं करते मरते वक़्त भी |

जिन्हे दो गज जमीन  नसीब नहीं होती..वो चुपचाप गुमनाम गहराईयों में समा जाते हैं ||

 

तारों का मेला तो लगा करेगा रातों को..पर ऐसे सितारे कम ही होंगे..|

जो टूटकर गिर जाएंगे..सर के बल टकराने को |

जब ऐसे सितारे चमकने बंद हो जाएंगे..और लोग बस अपने ऊपर ही रह जायेंगे |

क्या हम में से कोई अपनी जान की बाज़ी लगाएगा…|

दूसरो को रौशनी देने के लिए..बस दूसरों  के लिए..|

क्या कोई यूँ आसमान में जल पायेगा ?? – पथिक

 

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Hai Eesha !

अविश्वास में विश्वास का , मित्रता में दुर्भाव का |

सिर्फ बातों में शिष्टाचार का , शासन में भ्रष्टाचार  का |

कथनी करनी में कटाव का , सर्वत्र फैले अभाव का |

यह संसार बहुत प्यारा है ||

 

जवानी में मादकता का , समाज में अराजकता का |

नित्य बढ़ता कारोबार है , पैसे की भूख है बढ़ती |

अब शांत ही समाज रक्षकों का स्वाभाव है ||

 

आँखो  में बस खून है भरा , होठों पे कैसे प्यार है ?

कछुए सी बुद्धि  की गति , हृदय में अन्धकार है |

नियती अपनी खुद लिखते , मानवता शर्मसार है |

भोगों में लिप्त है जीवन , मार्गदर्शन आश्रित है दार्शनिक |

दर्शन का अभाव है ||

 

राम की कथाएं हैं , फकीरों की दरगाहें हैं |

बस पापों की चर्चाएं हैं  , और पापी विद्यमान हैं |

समय की गति है ये ? या मनुष्य की अवगति है ये ?

धरती वीर संत मुक्त लगती , हे ईश ! तेरा  इन्तजार है !! – पथिक

 

Image courtesy: http://wanderingmist.com/wp-content/uploads/2011/08/drown-me-o-sea_oil-painting-by-ishrath-humairah_palette-knife-strokes.jpg

Safar

शाम को देखकर महसूस होगा…खेलकर घर जाती लड़की सा इतराती है |

सूरज की मैली किरणों में तरवतर…एक शाम रास्ते पर निकल तो सही |

अलमारी में घुटती ज़िन्दगी…रास्तों पर ज़िंदादिली रहती है |

ज़िन्दगी को लिए संग अपने…किसी सफर पर निकल तो सही |

कभी घर से निकल तो सही ||

 

धूल-मिट्टी ही जंचती है…अब साजो-सामान थोड़े ही है |

फीते कसकर निकल घर से…जूतों की तली कुछ घिसे तो सही |

हाथी की सवारी न सही…कच्चे रास्ते पर पैदल सफर |

धूल भी मेहका देती है बदन…चौखट से बाहर कदम दस रख तो सही |

कभी घर से निकल तो सही ||

 

बंद कमरे बैठा ये तक न पता…झरोखे से झांकती पड़ोसन क्या कहती है |

मीठे शरबत सी मेजबानी…कभी मेहमान उसका बन तो सही |

कभी घर से निकल तो सही ||   -पथिक

.Image courtesy: http://nativepakistan.com/wp-content/uploads/Beautiful-View-of-a-Village-in-Punjab-Photos-of-villages-in-Pakistan.jpg