Chaitanyata Tere Man ki !

कान लगाकर सुनो हवाएं कुछ कहती हैं,  कह रही हैं वो बात जो तुम्हे पता है !!

धीरे धीरे गुनगुना रही हैं,  गा रही हैं वो राग जो तुम्हे पता है।

 

बच्चों सी चंचल हैं, जल सी शीतल हैं।

जो कहती हैं सच ही कहती हैं, मन की पीतल हैं।

हथेलियों को पलकों पर फिराती हैं, अधीर मन को धीरज बंधाती हैं,

जब भटकती है सोच तुम्हारी, तुम्हे वो याद दिलाती हैं, जो तुम्हे पता है।

 

साफ़ शब्दो से नहीं बोलती, वो दिल अपना तेरे दिल के सामने खोलती हैं,

भाव मन का  जब बाधित होता है, मन की तेरे अड़चनों को खोलती हैं,

वो झूमती हैं… वो झूमती हैं, कभी केश अपने तेरे चहरे पे खोलती हैं,

मन  में प्राण पुनः प्रतिष्ठित करती हैं, ये हवा नहीं चैतन्यता है,

तेरी… तेरे मन की…

आश्चर्य  नहीं होता ??

कैसे ये बोलती हैं… वही जो तुम्हे पता है।  -पथिक

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Vaadiyon Mai..!!

वादियों मे हुस्न यूँ न घोलो तुम,

के किसी ने कलियों पे सवेरा कम बिखेरा  है।

चांदनी सी शीतल, पर सूरज को जलाती,

उफ्फ !! ये खूबसूरती तुम्हारी…

भोर भये मेरे खयालो को घेरा है  !! -पथिक

 

 

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Ae Zindagi !

के काश हकीकत कुछ जुदा होती हकीकत से…. बहती ज़िन्दगी के हम दो किनारे न होते।

ऐ ज़िन्दगी बाँहों में भरले मुझे… के काश जीने के लिए नज़रों के ही बस सहारे न होते।

 

आसमानो में चलता, भोर भये उगते सूरज सा खिलता,

हकीकत को दोनों बाँहें खोलकर मिलता… न मैं होता, न तुम होते बस हम होते…

के काश हकीकत कुछ जुदा होती हकीकत से…. बहती ज़िन्दगी के हम दो किनारे न होते।

 

कब तक अंधेरों में जीया जाये ? घने बादलों से कभी झांक तो ऐ ज़िन्दगी…

हम यूँ ही पीछे हट जाएँ  कैसे मुमकिन है ? दांव पर लगाना क्या है बता ऐ ज़िन्दगी…

गर सोचते इतना तो क्या जमीन पर होते ?…आती जाती हवाओं के ही बस सहारे न होते।

के काश हकीकत कुछ जुदा होती हकीकत से…. बहती ज़िन्दगी के हम दो किनारे न होते।। -पथिक

 

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Roshan ho !!

थोड़े ज़ज्बात खाली कर, कलम उठा थोड़ी दवात खाली कर।

मायूस अंधेरो में कब तक घूमता रहेगा….

उफ़्क़ पर नयी उमीद उदय होती है…

लफ्ज़ो को अपने पर फैलाने दे…

उलट दे… उलट कर रख दे… दिल में जमी खटास खाली कर

कब तक घुटता रहेगा भीतर के धुऐं में, बाहर आ सब रोशन हो जाने दे ।। -पथिक

Aarjoo…

खाक में मिल जाऊं कैसे, एक ख्वाहिश… एक नयी आरजू जगी है…

कोई बीज बोता नहीं इनके… किसी कोने में दिल के रोज़ नयी आरजू उग आती है…

थका मैं भी नहीं बरसते बरसते… पर जड़े इनकी अभी भी प्यासी है…

बरसना होगा हदों तक… बरसना होगा लहू सूखने तक…

शोले भड़कते है इनकी छाँव में… के ज़िन्दगी अभी आरजुओं में बाकी है..

के ज़िन्दगी अभी आरजुओं में बाकी है..। -पथिक

 

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Panaah…zindagi ki..!

 

आँखों में किसी की पनाह मांगोगे,
जब किसी से प्यार हो जायेगा…
आईने से नज़र तब ही मिलाओगे,
जब खुद पर ऐतबार हो जायेगा।
गुमराह वही होते है जो मंजिलो की तलाश में निकलते है,
बिन मंजिल रास्ते भी गलत नहीं होते।
मौत इतनी भी बदसूरत नहीं,
मिले आँखे खोलकर तो मौत से भी प्यार हो जायेगा।
कतार में खिसकती हुई भी कोई ज़िन्दगी है,
भुला दोगे मंजिलो को तो रास्तों से प्यार हो जायेगा।
बहारें किसे पसंद नही आती,
पतझड़ में पतंग उड़ाके तो देखो।
कागज़ की कश्ती भी पार लगती हैं,
बारिश में नाव चलाकर तो देखो।
प्यास तो लगती है अथाह सागर में भी,
कुछ लोग बरसते तूफानों से प्यास बुझाते हैं।
चाहतें किसे नहीं होती,
चाहतों में अंतर होता है,
जो भेद मिटा देते हैं चाहतों का,
उन्हें जिंदगी से प्यार हो जाता है। -पथिक

Adhoori Mulakat

दिन भर का थका हारा था मैं, सूरज की गर्मी का मारा था मैं,

एक  उपवन मे हरी घास को…जन्नत ही मान रहा था मैं ।

ना जाने कब आँख लगी…न जाने कब वो आयी…

भीगे बदन से गिरती छीटों से जगा रही थी वो,

नज़ाकत से शरारत को हंसी मे छुपा रही थी वो…

चांदनी में तरवतार बदन, भयानक असमंजस प्रतिक्रिया पर मेरी…

योवन से मानो व्यंग कस रही थी वो…

यक़ीनन जन्नत कहानियों मे है…

वो… उसका बदन  खूबसूरती की सीमा थी,

पछताता हूँ चाँद से अपनी जलन को,

मेघो से चाँद को दूर करने को न कहता…

तो निशा से मेरी मुलाकात अधूरी न होती।।  -पथिक

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