Chaitanyata Tere Man ki !

कान लगाकर सुनो हवाएं कुछ कहती हैं,  कह रही हैं वो बात जो तुम्हे पता है !!

धीरे धीरे गुनगुना रही हैं,  गा रही हैं वो राग जो तुम्हे पता है।

 

बच्चों सी चंचल हैं, जल सी शीतल हैं।

जो कहती हैं सच ही कहती हैं, मन की पीतल हैं।

हथेलियों को पलकों पर फिराती हैं, अधीर मन को धीरज बंधाती हैं,

जब भटकती है सोच तुम्हारी, तुम्हे वो याद दिलाती हैं, जो तुम्हे पता है।

 

साफ़ शब्दो से नहीं बोलती, वो दिल अपना तेरे दिल के सामने खोलती हैं,

भाव मन का  जब बाधित होता है, मन की तेरे अड़चनों को खोलती हैं,

वो झूमती हैं… वो झूमती हैं, कभी केश अपने तेरे चहरे पे खोलती हैं,

मन  में प्राण पुनः प्रतिष्ठित करती हैं, ये हवा नहीं चैतन्यता है,

तेरी… तेरे मन की…

आश्चर्य  नहीं होता ??

कैसे ये बोलती हैं… वही जो तुम्हे पता है।  -पथिक