Ae Zindagi !

के काश हकीकत कुछ जुदा होती हकीकत से…. बहती ज़िन्दगी के हम दो किनारे न होते।

ऐ ज़िन्दगी बाँहों में भरले मुझे… के काश जीने के लिए नज़रों के ही बस सहारे न होते।

 

आसमानो में चलता, भोर भये उगते सूरज सा खिलता,

हकीकत को दोनों बाँहें खोलकर मिलता… न मैं होता, न तुम होते बस हम होते…

के काश हकीकत कुछ जुदा होती हकीकत से…. बहती ज़िन्दगी के हम दो किनारे न होते।

 

कब तक अंधेरों में जीया जाये ? घने बादलों से कभी झांक तो ऐ ज़िन्दगी…

हम यूँ ही पीछे हट जाएँ  कैसे मुमकिन है ? दांव पर लगाना क्या है बता ऐ ज़िन्दगी…

गर सोचते इतना तो क्या जमीन पर होते ?…आती जाती हवाओं के ही बस सहारे न होते।

के काश हकीकत कुछ जुदा होती हकीकत से…. बहती ज़िन्दगी के हम दो किनारे न होते।। -पथिक

 

Image courtesy: http://forums.familyfriendpoems.com/files/marocaze/201476192455_15228-feather-life-and-love_large.jpg

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