Adhoori Mulakat

दिन भर का थका हारा था मैं, सूरज की गर्मी का मारा था मैं,

एक  उपवन मे हरी घास को…जन्नत ही मान रहा था मैं ।

ना जाने कब आँख लगी…न जाने कब वो आयी…

भीगे बदन से गिरती छीटों से जगा रही थी वो,

नज़ाकत से शरारत को हंसी मे छुपा रही थी वो…

चांदनी में तरवतार बदन, भयानक असमंजस प्रतिक्रिया पर मेरी…

योवन से मानो व्यंग कस रही थी वो…

यक़ीनन जन्नत कहानियों मे है…

वो… उसका बदन  खूबसूरती की सीमा थी,

पछताता हूँ चाँद से अपनी जलन को,

मेघो से चाँद को दूर करने को न कहता…

तो निशा से मेरी मुलाकात अधूरी न होती।।  -पथिक

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