Samundar ki Bebasi

कब तक चाहता रहेगा ज़िन्दगी को,

ज़िन्दगी को ज़िन्दगी पे छोड़ तो सही…

खुद की कैद से खुद को आज़ाद  कर,

ये सोच ही गलत है के – फिर वही ! फिर वही !….

 

आफ़ताब केवल जलाता नहीं है..

दिल पर जमी हर पर्त को इसमें पिघला देना।

हर हसीना के जाम को अंजाम होठो से देना,

नया दिन नया दौर होगी दिलकशी।

 

देख रोमांच कैसे दौड़ता है रगों में,

हवाले कर दे खुद को लहरों के।

ऐतबार कर सिर्फ इतना के हर लहर किनारे तक जाएगी,

मुह छुपाते फिरेगी समुन्दर की  बेबसी ।। – पथिक

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