WO!

वो इस कदर रूबरू होती थी मेरे अहसासों से,

मेरे अहसास आज भी महकतें  है।

तपती ज़िन्दगी में तेरी जुल्फों के साये,
बाल संवारते कभी नज़र तो आये…
हम उड़ाना नही जानते पर…
कटी पतंगों के पीछे तेरी गलियों में दौड़ते थे।। – पथिक
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Naavik

पतवार टूट जाये तो नाविक क्या करे.. ?

नाव के साथ रहे..लहरों के भरोसे..?

या समुन्दर में कूद जाये…हौसले के भरोसे..?

 

शायद क्षितिज पर किनारा होता.. तो तैरकर जाना आसान लगता.. ।

अब जब हर दिशा जल मग्न है… तो नाविक क्या करे ?

अगर क्षितिज पर मेघ गरजते… तो नाव में ही रहता…।

अब जब आसमान साफ़ है तो…नाविक क्या करे… ?

 

ये ज़िन्दगी बस यही लगती है… ।

समुन्दर की तरह…अथाह अनन्त…।

कभी मौत सी शांत… कभी तूफानों सी जीवंत… ।

और हम नाविक एक नाव पर… हर पल एक दुविधा में… ।

नाविक क्या करे… ??  -पथिक

 

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Rasm-adaai

कितने वक़्त तक रोशन था… मालूम नहीं…

दिया जला… जलकर बुझ गया….

न शगुन हुआ न अपशगुन…

रस्म अदाई की बात थी…. हो गयी… !! -पथिक

 

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Aaj Bhi

आज भी चुप हूँ मैं , आज भी समझने के कोशिश कर रहा हूँ।

आज भी उन्हीं सवालों से घिरा हूँ , आज भी जवाब पाने की कोशिश कर रहा हूँ।

आज भी तुम्हे याद करता हूँ , आज भी तुम्हे भूलाने की कोशिश कर रहा हूँ।

आज भी खत लिखता हूँ तुम्हें , आज भी जवाब आने की उम्मीद कर रहा हूँ।

कबसे रुकी है ज़िन्दगी , आज भी आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ।

आज भी अकेला चल रहा हूँ राहों में , आज भी हमसफ़र को पाने की दुआ कर रहा हूँ ।। -पथिक

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