Sahasi Zindagi

साहसी ज़िंदगी।

गिरती उठती, कभी हार न मानती।

गर्मी में तपती, सर्दी में ठिठुरती।

सावन में मौज उड़ाती ज़िन्दगी।

बड़ी साहसी ज़िन्दगी।।

साहसी ज़िन्दगी।

आकाश को कभी बाहों में भरती,

कभी पानी में गोते  खाती ज़िन्दगी।

कभी अंतरिक्ष की ऊंचाइयों को चूमती,

कभी पाताल में पटकी खाती ज़िन्दगी।

कभी न रूकती, कभी न झुकती।

गिरती उठती, कभी हार न मानती।

हवाओं पे धोंस जमाती ज़िन्दगी।

बड़ी साहसी ज़िन्दगी।।

साहसी ज़िन्दगी।

कभी खिल उठती फूलों की तरह,

कभी बिन मौसम मुरझाती ज़िन्दगी।

कभी भूखे पेट सो जाती।

कभी पर्व मनाती ज़िन्दगी।

गिरती उठती, कभी हार न मानती।

बादलों पे दौड़ लगाती ज़िन्दगी।

बड़ी साहसी ज़िन्दगी।।   – पथिक

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Madhur Hawa ke Geet

मधुर मधुर मृदुल मृदुल, मधुर हवा के गीत |

आसमान की नीली छाया, ये प्यार संगीत |

दिल मांगे आवाज़ चाँद से, महफ़िल में तारों के बीच |

मधुर मधुर मृदुल मृदुल, मधुर हवा के गीत…||

 

ये स्पर्श बड़ा अनोखा, जुगनू का तारों सा धोखा |

मन की अपनी बात अनोखी, बादल की अपनी प्रीत |

मधुर मधुर मृदुल मृदुल…||

 

बादल भी अपना भेद छुपाये, बहती हवा में बहता जाये |

सर सर करती हवा पुकारे, नीचे क्यों बैठा मुझे निहारे |

ओ मेरे मनमीत…|

मदर मधुर मृदुल मृदुल….||

 

बादल का उर भरने आया, नभ पर छाए काली छाया |

क्यों गाता है अपनी उदासी, मुझ  पर बरसा दे अपना सारा शोक |

और बसजा तारो के बीच…|

मधुर मधुर मृदुल मृदुल…||

 

मन कहता है सुनता जाऊँ, कभी मैं भी तारों संग गाऊँ |

पर कोई नहीं सुनता मुझको, ये हवा बड़ा गाती सुन्दर है |

ये हवा बड़ा गाती सुन्दर है, ये हवा बड़ी निर्भीक |

मधुर मधुर,मृदुल मृदुल…||

 

मैं बादल से करता बिनती, जरा ठहर कुछ दिखता मुझको |

इससे पहले कोई तस्वीर जो बनती, सखी निंद्रा हवा की आई |

कहीं कलेश दोनों में न हो जाए, डरकर मैंने ली आँखे मीच |

मधुर मधुर, मृदुल मृदुल, मधुर हवा के गीत || – पथिक

 

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Safar

शाम को देखकर महसूस होगा…खेलकर घर जाती लड़की सा इतराती है |

सूरज की मैली किरणों में तरवतर…एक शाम रास्ते पर निकल तो सही |

अलमारी में घुटती ज़िन्दगी…रास्तों पर ज़िंदादिली रहती है |

ज़िन्दगी को लिए संग अपने…किसी सफर पर निकल तो सही |

कभी घर से निकल तो सही ||

 

धूल-मिट्टी ही जंचती है…अब साजो-सामान थोड़े ही है |

फीते कसकर निकल घर से…जूतों की तली कुछ घिसे तो सही |

हाथी की सवारी न सही…कच्चे रास्ते पर पैदल सफर |

धूल भी मेहका देती है बदन…चौखट से बाहर कदम दस रख तो सही |

कभी घर से निकल तो सही ||

 

बंद कमरे बैठा ये तक न पता…झरोखे से झांकती पड़ोसन क्या कहती है |

मीठे शरबत सी मेजबानी…कभी मेहमान उसका बन तो सही |

कभी घर से निकल तो सही ||   -पथिक

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Ek Sitara

कितनों को उम्मीद बँधाता है…एक मामूली टूटता सितारा |

हम तो फिर भी गर्दिश के वो तारे हैं..जिन्हे धरती अपने सीने में जगह देती है |

वो टूटते सितारे खूब सिखाते हैं..शोर नहीं करते मरते वक़्त भी |

जिन्हे दो गज जमीन  नसीब नहीं होती..वो चुपचाप गुमनाम गहराईयों में समा जाते हैं ||

 

तारों का मेला तो लगा करेगा रातों को..पर ऐसे सितारे कम ही होंगे..|

जो टूटकर गिर जाएंगे..सर के बल टकराने को |

जब ऐसे सितारे चमकने बंद हो जाएंगे..और लोग बस अपने ऊपर ही रह जायेंगे |

क्या हम में से कोई अपनी जान की बाज़ी लगाएगा…|

दूसरो को रौशनी देने के लिए..बस दूसरों  के लिए..|

क्या कोई यूँ आसमान में जल पायेगा ?? – पथिक

 

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Hai Eesha !

अविश्वास में विश्वास का , मित्रता में दुर्भाव का |

सिर्फ बातों में शिष्टाचार का , शासन में भ्रष्टाचार  का |

कथनी करनी में कटाव का , सर्वत्र फैले अभाव का |

यह संसार बहुत प्यारा है ||

 

जवानी में मादकता का , समाज में अराजकता का |

नित्य बढ़ता कारोबार है , पैसे की भूख है बढ़ती |

अब शांत ही समाज रक्षकों का स्वाभाव है ||

 

आँखो  में बस खून है भरा , होठों पे कैसे प्यार है ?

कछुए सी बुद्धि  की गति , हृदय में अन्धकार है |

नियती अपनी खुद लिखते , मानवता शर्मसार है |

भोगों में लिप्त है जीवन , मार्गदर्शन आश्रित है दार्शनिक |

दर्शन का अभाव है ||

 

राम की कथाएं हैं , फकीरों की दरगाहें हैं |

बस पापों की चर्चाएं हैं  , और पापी विद्यमान हैं |

समय की गति है ये ? या मनुष्य की अवगति है ये ?

धरती वीर संत मुक्त लगती , हे ईश ! तेरा  इन्तजार है !! – पथिक

 

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